" इच्छाएं अनेक : समाधान एक "


बर्षा में सूखे की चाहत ,
सूखे में बर्षा के गीत ।
सर्दी में गर्मी की इच्छा ,
गर्मी में मिल जाये शीत ।
तेरी विपरीत चाहतों का , है कोई पारावार नहीं।
ईश्वर को ठहराता दोषी , करता
स्वयं विचार नहीं ।

जब रहता खेत कछारों में ,
तब शहरी चकाचौंध की चाह।
शहरों के रेल पेल धक्कों में ,
भरे ग्राम्य - जीवन की आह ।
चंचल मन के अनेक सपने , हो सकते साकार नहीं !
हर एक की हर मनोकामना , ले सकती आकार नहीं ॥
ईश्वर को
ठहराता दोषी , करता स्वयं विचार नहीं ।

मछुआरा सागर में सोचे ,
लांघ सकूँ पर्वत शिखरों को !
पर्वतीय की प्रबल कामना ,
चीर सकूँ सागर लहरों को ।
अंत नहीं पर्वत शिखरों का , सागर भी कम विस्तार नहीं ।
इच्छाएं अपनी सीमित करने का, करता कभी विचार नहीं ॥
ईश्वर को ठहराता दोषी , करता
स्वयं विचार नहीं ।

न कहीं दुःख है , न कहीं सुख है ,
सब है यह मन का व्यवहार ।
मन पर जिस दिन कसा शिकंजा ,
खुल जाये मुक्ति का द्वार !
प्रक्रति की प्रतिकूलताओं को, करता क्यों स्वीकार नहीं !
सारे जग को बदलना चाहे ,
स्वयं बदलने तैयार नहीं ॥

ईश्वर को ठहराता दोषी , करता
स्वयं विचार नहीं ।
नश्वर में मन , मोह लगाता ,
क्षण भंगुर से प्रीति बढाता।
माया के जब झटके खाता,
हाय हाय करके चिल्लाता।
सुख दुःख राग द्वेष से हटकर, करता कभी विचार नहीं ।
मिथ्या और सत्य समझे बिन , होगा शाश्वत साकार नहीं ॥
ईश्वर को ठहराता दोषी , करता
स्वयं विचार नहीं ।।
०७/०७/२०१०

1 comments:

Swati July 14, 2010 at 7:38 AM  

papaji bahut acchi aur sateek poem hai. :)

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सृजन सैनिकों के लिए प्रेरक प्रसंग

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