"परमार्थ पथ के हे पथिक "



परमार्थ पथ के हे पथिक,

अभी तो पार करने हैं , अगम पथ इन पगों से ही।
इन पगों को और गतिमान, करने की जरुरत है॥
अभी हर कंठ को सन्देश देना है मधुरता का ,
अभी हर आँख को गम देख , नम होना सिखाना है ।
सभी बाहें करें प्रण , दीन दुखियों की सुरक्षा का ,
कि है इंसानियत जिन्दा, ज़माने को दिखाना है ।
अभी तो हो रही प्रारंभ , जगत हित की कहानी ही ,
जगत हित की कहानी को , आगे बढाने की जरुरत है॥

अभी तो भरे ही हैं नए युग की नीव में पत्थर ,
सभी अपना कहें जिसको , भवन ऐसा बनाना है ।
सभी इंसान जिसमे रह सकें, इंसान बनकर ही ,
नया संसार ऐसा प्यार का , हमको बनाना है ।
नहीं यह कल्पना बल्कि , सचाई है नए युग की ,
नए युग की इमारत को सजाने की जरुरत है ॥
न जब तक लक्ष्य पर पहुचे , थकन कैसी घुटन कैसी ,
किनारे बैठना थककर , कायरों की निशानी है ॥

है जवानी वह जो लगा दे आग पानी में, जरुरत पर ,
परमार्थ पथिकों की धरा पर, सदा रहती कहानी है ॥
सृजन शेष है , युग विशेष है, है यही युग धर्म की चाहत ,
अभी तो नव निर्माण की गंगा बहाने की जरुरत है !!

१४/०४/०७



1 comments:

Swati July 9, 2010 at 12:32 AM  

papaji bohot acchi aur inspiring poem hai. :)
do spelling mistakes hain .
1.pathik ko paathik likha hai
2. srijan ko sarjan likha hai.

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सृजन सैनिकों के लिए प्रेरक प्रसंग

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